सोमवार, 8 अगस्त 2016

कुछ कशमकश बन गयी है ज़िन्दगी..
कुछ अपनों से ठन गयी है ज़िन्दगी..
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एहसास होता है अक्सर ज़िंदा होने का..
न जाने क्यों बेरंग सी रंग गयी है ज़िन्दगी...
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कुछ ग़म थे,कुछ खुशियां थीं...
कुछ रास्ते थे तो कुछ दूरियां थीं...
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कुछ आँखें भीगी थीं,कुछ में नुकीली छुरियाँ थीं..
पर जीत हार के सिलसिले से दूर हो गयी है
ज़िन्दगी..
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कुछ दोस्त थे,दोस्ती अनमोल थी जिनकी...
कुछ दुश्मन थे,दुश्मनी बेबोल थी जिनकी...
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कुछ दुआएं थीं,कीमत अनमोल थी जिनकी...
न जाने इनसे भी क्यों मजबूर हो गयी है ज़िन्दगी...
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एक चाहत है माँ के गोद में सोने की,
एक राहत है,पिता से कुछ मांग कर रोने की..
एक मर्ज़ी है बहन से देर रात गर्म खाना बनवाने की..
एक आरज़ू है छोटे भाई को पढते में सताने की...
एक याद है,छोटे भाइ को कन्धे पर घुमाने की...
न जाने इन सब से कब लिपट गयी है ज़िन्दगी...
कुछ कशमकश बन गयी है ज़िन्दगी...
कुछ रुक सी ठहर से गयी है ज़िन्दगी...

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